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एक अंतहीन कसक: Deepa Mishra

 "आमिष" - एक अंतहीन कसक ## (फिल्म समीक्षा )

ग्रीक माइथोलोजी में हमें मुख्यतः आठ प्रकार के प्रेम का वर्णन देखने को मिलता है।इरोज ( eros):यौन जनित इच्छाएं और प्रेम ,फिला( philla):अत्यधिक मित्रता, लूडस ( ludus):जहां प्रेम महज एक खेल है आप इसे फ्लर्टिंग भी कह सकते हैं, अगेप ( agape) :विशुद्ध प्रेम जिसमें त्याग होता है,जैसे ईश्वर के प्रति प्रेम, प्रैग्मा(pragma): प्रेम का उत्कृष्ट रूप जो सतत रूप से चलने वाला प्रेम है, जिसमें व्यक्ति निस्वार्थ भाव से प्रेम करता, फिलौसिया(philautia): स्वप्रेम, स्टॉर्ज( storge): पारिवारिक प्रेम और मेनिया ( mania): जिसे आप आब्सेसिव लव( obsessive love) कहते हैं ।मेनिया एक प्रकार की मनोवृत्ति है या कहिए ऐसी मन:स्थिति जिसमें केवल एक व्यक्ति या वस्तु के विषय में ही सोचा जा सके।
असमिया फिल्म "आमिष" इसी विषय को लेकर बनाई गई है। प्रेम के विभिन्न रूपों को दर्शाते हुए अंत में आप स्वयं निर्णय की स्थिति में पहुंचते ही आखिर यह क्या था। अगर आप प्रेम के विभिन्न प्रकारों की जानकारी रखते हैं तो इसे आप और अच्छी तरह समझ पाएंगे। निर्देशक भास्कर हजारीका की निर्देशित फिल्म आपको कतिपय सवालों के संग छोड़ती है। अनुराग कश्यप का यह कहना कि 'भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्म नहीं बनी थी' उचित ही है। कुछ चीजें अश्रुतपूर्व, अभूतपूर्व और अकल्पनीय हो सकती हैं, यह इस फिल्म को देखकर आप समझ सकते।
पी एच डी शोधकर्ता सुमोन(अर्घदीप बरूहा)की मुलाकात जब बच्चों के डॉक्टर निर्मली(लीमा दास) से होती तो उनको एक कड़ी आपस में जोड़ती है और वह है आमिष अर्थात मांस।
मांसाहार के प्रेमी दोनों आपस में उसी से संबंधित बातें करते दिखाई देते हैं। शुरुआत में फिल्म लगता है सिर्फ मांस प्रेमियों के लिए ही बनाई गई है और जैसे-जैसे बकरी, मुर्गी, बिल्ली, कुत्ते, चमगादड़ से लेकर विभिन्न प्रकार के कीड़े- मकोड़े तक का मांस बनाया परोसा और प्रेम पूर्वक खाया खिलाया जाता है देखकर आपको उकताहट सी होने लगेगी और आप शायद फिल्म के आधे में ही विदा ले लें। पर यकीन मानिए यहीं आप गलत कर बैठेंगे। असली शुरुआत तो यहीं से होती है। आगे की फिल्म शायद आपकी परिकल्पना से परे हो।दाद देनी पड़ेगी निर्देशन और पटकथा को जिन्होंने इस हद तक अपनी सोच का विस्तार किया है। यह मामूली नहीं है।

निर्मली एक विवाहिता है।उसका पति डॉक्टर है जो उसे बेइंतहा प्यार करता है।एक बेटा भी है। वह अपने काम, अपने परिवार के प्रति पूर्णतया समर्पित स्त्री है। लेकिन अगर भूख पर गौर करें तो शारीरिक और मानसिक भूख से परे एक और भूख होती है और वह है आत्मा की भूख।जिस भूख के आगे हम किस हद तक विवश हो सकते हैं सोचा भी नहीं जा सकता। उस स्थिति में हम सही गलत का निर्णय करने की दशा में भी खुद को नहीं पाते हैं ।
मांसप्रेम सुमोन और निर्मली को एक दूसरे के करीब लाता है और यह मित्रता एक ऐसा संसार रचती है जिसकी परिकल्पना आप बिना फिल्म देखे नहीं समझ सकते। यह फिल्म कई सवाल अपने पीछे छोड़ जाती है मसलन:
क्या एक दूसरे को छुए बिना ही एक दूसरे में पूर्णतया समाहित हुआ जा सकता है?
मर्यादित और अमर्यादित के बीच की सीमा रेखा किस प्रकार तय की जा सकती?
इंसान की भूख उसे किस हद तक ले जा सकती?
"आमिष" 2019 में रिलीज हुई थी। फिल्म देखने के बाद अपनी मन:स्थिति में आपको स्वतः परिवर्तन होते दिखाई पड़ेगा। शायद एक...... "कसक"


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चुन-चुन खाइयो मांस: Prabhat Ranjan

एक बार मैं एक दोस्त के साथ खाना खा रहा था. अचानक से दाल की कटोरी से उसने झपटा मार के कुछ उठाया और मुँह में डाल लिया. जब तक मैं कुछ समझता, हँसते हुए उसने कहा- चिंता मत कीजिए मैं आपको नहीं खिलाऊँगी. दाल में गलती से एक टुकड़ा मछली का आ गया था.
भाष्कर हजारिका की असमिया फिल्म ‘आमिस’ देखते हुए यह प्रसंग मेरे मन में आता रहा. प्रसंगवश, मैं वेजिटेरियन हूँ और मेरी दोस्त उत्तर-पूर्व से थी,  जहाँ पर खान-पान की संस्कृति उत्तर भारतीयों से भिन्न है.
इस फिल्म का मुख्य पात्र सुमन एक शोधार्थी है जो एंथ्रापलॉजी विभाग में उत्तर-पूर्व में मांस खाने की संस्कृतियों के ऊपर शोध (पीएचडी) कर रहा है. निर्मली जो पेशे से डॉक्टर है और स्कूल जाते बच्चे की माँ है अपने वैवाहिक जीवन से नाखुश है. उसका डॉक्टर पति अपने सामाजिक काम से ज्यादातर शहर से बाहर रहता है और निर्मली के जीवन में नीरसता है. उसके जीवन में सुमन का प्रवेश होता है और दोनों के बीच तरह तरह के मांस खाने को लेकर मुलाकातें होती है, प्रेम (?) पनपता है- शास्त्रीय शब्दों में जिसे परकीया प्रेम कहा गया है. लेकिन फिल्म में दोनों के बीच साहचर्य का अवसर कम है और सहसा विकसित प्रेम के इस रूप से खुद को जोड़ना मुश्किल होता है. सिनेमा देश-काल को स्थापित करने में असफल है.  क्या हम इसे खाने के पैशन से विकसित ऑब्सेशन कहें?
खान-पान को लेकर विकसित संबंध को हमने ‘लंच बाक्स’ फिल्म में भी देखा था, पर आमिस फिल्म के साथ किसी भी तरह की तुलना यहीं खत्म हो जाती है.
इस फिल्म में मांस एक रूपक है जो समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को अभिव्यक्ति करने में सफल है. पर यह मानवीय प्रेम के आधे-अधूरे जीवन को ही व्यक्त कर पाता है. क्या संपूर्णता की तलाश व्यर्थ है?  क्या दोनों के बीच प्रेम का कोई भविष्य नहीं?
फिल्म में अदाकारी, सिनेमैटोग्राफी, संपादन और बैकग्राउंड संगीत उत्कृष्ट है. सिनेमा गुवाहाटी में अवस्थित (locale) है, जिसे सिनेमा में खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है. सिनेमा चूँकि श्रव्य-दृश्य माध्यम है इस वजह से महज कहानी में घटा कर हम इसे नहीं पढ़ सकते. जाहिर है आमिस के कई पाठ संभव हैं, पर यह फिल्म अपने ‘अकल्पनीय कथानक’ की वजह से चर्चा में है. जहाँ अंग्रेजी मीडिया में आमिस को लेकर प्रशंसा के स्वर हैं, वहीं असमिया फिल्मों के करीब 85 वर्ष के इतिहास में इस फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच तीखी बहस जारी है.
परकीया प्रेम को लेकर पहले भी फिल्में बनती रही हैं, साहित्य लिखा जाता रहा है. फिल्म खान-पान की संस्कृति को लेकर किसी नैतिक दुविधा या समकालीन राजनैतिक शुचिता पर चोट करने से आगे जाकर लोक में व्याप्त तांत्रिक आल-जाल में उलझती जाती है. मिथिला की बात करुँ तो कुछ जातियों में शादी से पहले वर-वधू की अंगुली से थोड़ा सा नाम मात्र का खून (नहछू?) निकाला जाता है, जिसे खाने में मिला कर एक-दूसरे को खिलाया जाता है. यह परंपरा के रूप में आज भी व्याप्त है. मिथिला की तरह असम में भी तंत्र-मंत्र का प्रभाव रहा है और ख़ास तौर पर कामरूप प्रसिद्ध रहा है. फिल्म में मांस के बिंब को प्रेमी-प्रेमिका के (स्व) मांस भक्षण के माध्यम से स्त्री-पुरुष के संयोग की व्याप्ति तक ले जाना, दूर की कौड़ी लाना है. कला में तोड़-फोड़ अभिव्यक्ति के स्तर पर जायज है, पर कल्पना के तीर को इतना दूर खींचना कि तीतर और बटेर की जगह मानव के मांस के टुकड़े हाथ आए तो इसे हम क्या कहेंगे? इसे हम अभिनव प्रयोग तो नहीं ही कह सकते.
प्रेम के स्याह पक्ष को चित्रित करते हुए यह फिल्म आखिर में एब्सर्ड की  तरफ मुड़ जाती है.
प्रेम में कागा से ‘चुन-चुन खाइयो मांस’ की बात करते हुए दो अँखियन को छोड़ने की बात भी की गई है जिसे पिया मिलन की आस है. यहाँ तो प्रेम उन आँखों को ही निगलना चाहता है. आँखें ही नहीं बचेंगी तो फिर दर्शक (प्रेमी) देखेगा क्या?

हर एक असमिये का सिर गर्व से ऊँचा कर देने जैसी है: Manoj Pandey

एक प्रादेशिक भाषा में बनी फ़िल्म भी लीक से इतनी हटकर हो सकती है — इसकी उम्मीद भारतीय फ़िल्म जगत में कम ही होती है और ऐसा होना बहुत दुर्लभ भी है। असम के युवा लेखक-निर्देशक भास्कर हजारिका की फ़िल्म ‘आमिस’ सही मायनों में नेशनल फ़िल्म-डिस्कोर्स के पटल पर हर एक असमिये का सिर गर्व से ऊँचा कर देने जैसी है।
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‘आमिस’ मूलतः असमिया भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है: माँसाहारी. फ़िल्म का शीर्षक यही क्यों है — इसका फ़िल्म की कहानी से सीधा संबंध है। यह भेद फ़िल्म के दूसरे आधे हिस्से में प्रवेश करते ही खुल जाता है।
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यह फ़िल्म खाने-पीने के शौकीन दो ऐसे लोगों की कहानी है, जो एक दूसरे से अपरिचित होने के बाद भी माँसाहार के मामले में मिलती-जुलती पसंद के कारण परस्पर खिंचे चले जाते हैं। निर्मली (लीमा दास अभिनीत) और सुमन (अर्घदीप बरुआ), दोनों को खाने में नए-नए प्रयोग करने की आदत है। दोनों को इस समानता का बोध होता है और वे मिलते-मिलते एक-दूसरे के प्रति लगाव महसूस करने लगते हैं।
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निर्मली अधेड़-उम्र की एक विवाहिता है और पेशे से एक डॉक्टर। सुमन एक युवा रिसर्च-स्कॉलर है और वह पूर्वोत्तर-भारत में खाये जाने वाले अलग-अलग तरह के माँसाहारी व्यंजनों पर शोध कर रहा है। सुमन को नए-नए माँसाहारी व्यंजन पकाने का शौक है। पति के अक्सर बाहर रहने के कारण निर्मली की ज़िंदगी में अकेलापन है, जो उसे सुमन में भरता हुआ दिखता है। हालाँकि दोनों को अपनी मर्यादाओं का बख़ूबी आभास है और फ़िल्म में एक सीन भी ऐसा नहीं है, जहाँ उन्होनें सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ने की कोशिश की हो।
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निर्मली और सुमन का प्रेम भौतिकता के बंधनों से परे है। दोनों जब भी मिलते हैं तो एक-दूसरे को अनूठे माँसाहारी व्यंजनों का स्वाद चखाकर इस प्रेम को परिपूरित महसूस करते हैं। माँसाहार चखने की यह आदत फ़िल्म का अंत आते-आते ऐसा घिनौना रूप ले चुकी होती है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
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फ़िल्म नवम्बर 2019 में आई थी। मुझे नहीं पता कितने लोगों ने देखी। पर हर-एक असमिये को, चाहे वो फ़िल्मों का शौकीन हो या न हो, यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए और गर्व करना चाहिए कि इस स्तर की फ़िल्म एक क्षेत्रीय भाषा में बनी है। इससे पहले एक असमिया फ़िल्म की चर्चा शायद ही इतनी कभी हुई होगी।
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बॉलीवुड डाइरेक्टर अनुराग कश्यप ने ख़ुद सोशल मीडिया पर आकर फ़िल्म को प्रमोट किया था और कहा था कि आमिस एक अनोखी फ़िल्म है। वाक़ई में आमिस की कहानी अनोखी है। लेखक-निर्देशक भास्कर हजारिका के इस साहसिक कदम की सराहना करनी चाहिए। फ़िल्म रुपहले पर्दे पर हिट है।


तमाम पारम्परिक नैरेटिव संरचनाओं में तोड़फोड़ करने वाली विस्मयकारी असमिया फ़िल्म 'आमिस': Mihir Pandey

"समीक्षाओं में आपने पढ़ा होगा कि 'आमिस' फ़िल्म भोजन के बारे में है। ग़लत पढ़ा है। दरअसल ये फ़िल्म भोजन के बारे में है ही नहीं। ये फ़िल्म अतृप्त इंसानी कामनाओं और उन पर लगाए जाने वाले बंधनों के बारे में है। भोजन यहाँ सिर्फ़ एक मैटाफ़र है और क्या कमाल का मैटाफ़र है। इसलिए भी क्योंकि बीते कुछ सालों में इसे हमारे मुल्क में जीने-मरने का, और मरने-मारने का प्रश्न बना दिया गया है। इसलिए भी, क्योंकि फिर भी यह इंसानी शरीर की सबसे मौलिक ज़रूरत है। मरने वाले की भी और मारने वाले की भी। ठीक वैसे ही जैसे प्रेम इंसानी शरीर की सबसे मौलिक ज़रूरत है।
कबीर याद आते हैं,
'बालम आव हमारे गेह रे,
तुम बिन दुखिया देह रे।'
यह फ़िल्म एक ऐसे समाज के प्रति चेतावनी है जिसमें कुछ लोग मिलकर बाक़ी लोगों के जीवन का स्वरूप तय करते हैं। उनके पहनावे का स्वरूप तय करते हैं, उनके खानपान का स्वरूप तय करते हैं, उनके प्रेम का स्वरूप तय करते हैं, उनकी देशभक्ति का स्वरूप तय करते हैं।
नैतिकताएं सदा समाज सापेक्ष और समय सापेक्ष होती हैं, पर एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति निश्छल प्रेम समाज सापेक्ष नहीं होता। जब सामाजिक नैतिकता इंसानी स्वभाव को ‘सही’ और ‘गलत’ की कसौटी पर कसने लगती है तो यह खतरे की घंटी है। ‘आमिस’ का साफ़ कहना है कि इंसानी स्वभाव को उसकी निश्छल अभिव्यक्ति से रोकना जैसे किसी उबलते प्रेशर कुकर पर से सेफ़्टी वॉल्व हटा लेना है।"
~ तमाम पारम्परिक नैरेटिव संरचनाओं में तोड़फोड़ करने वाली विस्मयकारी असमिया फ़िल्म 'आमिस' पर फ़रवरी 'हंस' के 'आराम नगर' में लिखते हुए

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Obsession, আৰু ইয়াৰ পাৰ্শ্বক্ৰিয়াঃ : Bikash Dutta

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